सुनाया। होश उड़ गए। उपले-ईंधान की सुधि न रही। सीधो नायकराम के यहाँ पहुँचा। बजरंगी ने कहा-आओ सूरे, बड़ी देर लगाई, क्या अभी चले आते हो? आज तो यहाँ बड़ा गोलमाल हो गया।
सूरदास-हाँ, जमुनी ने मुझसे कहा। मैं तो सुनते ही ठक रह गया।
बजरंगी-होनहार थी, और क्या। है तो लौंडा, पर हिम्मत का पक्का है। जब तक हम लोग हाँ-हाँ करें, तब तक फिटन पर से कूद ही तो पड़ा और लगा हाथ-पर-हाथ चलाने।
सूरदास-तुम लोगों ने पकड़ भी न लिया?
बजरंगी-सुनते तो हो, जब तक दौड़ें, तब तक तो उसने हाथ चला ही दिया।
सूरदास-बड़े आदमी गाली सुनकर आपे से बाहर हो जाते हैं।
जगधार-जब बीच बाजार में बेभाव की पड़ेंगी, तब रोएँगे। अभी तो फूले न समाते होंगे।
बजरंगी-जब चौक में निकले, तो गाड़ी रोककर जूतों से मारें।
सूरदास-अरे, अब जो हो गया, सो हो गया, उसकी आबरू बिगाड़ने से क्या मिलेगा?
रही। बार-बार यही खयाल आता-सोफी अपने मन में क्या कहेगी। मैंने उससे कह रखा है कि मेरे स्वामी मेरी कोई बात नहीं टालते। अब वह समझेगी, वह इसकी बात भी नहीं पूछते। बात भी ऐसी ही है, इन्हें मेरी क्या परवा है? बातें ऐसी करेंगे, मानो इनसे उदार संसार में कोई प्राणी न होगा, पर वह सब कोरी बकवास है? इन्हें तो यही मंजूर है कि यह दिन-भर अकेली बैठी अपने नाम को रोया करे। दिल में जलते होंगे कि सोफी के साथ इसके दिन आराम से गुजरेेंगे। मुझे कैदियों की भाँति