नायकराम को कुछ तो राजा महेंद्रकुमार के आश्वासन, कुछ विजया की तरंग और कुछ अपनी शक्ति के ज्ञान ने उच्छृंखल बना दिया था। लाठी सीधी करता हुआ बोला-लट्ठमार पाँड़े!
इस जवाब में हेकड़ी की जगह हास्य का आधिाक्य था। प्रभु सेवक का बनावटी क्रोध हवा हो गया। हँसकर बोले-तब तो यहाँ ठहरने में कुशल नहीं है, कहीं बिल खोदना चाहिए।
नायकराम अक्खड़ आदमी था। प्रभु सेवक के मनोभाव न समझ सका। भ्रम हुआ-यह मेरी हँसी उड़ा रहे हैं, मानो कह रहे हैं कि तुम्हारी बकवास से क्या होता है, हम जमीन लेंगे और जरूर लेंगे। तिनककर बोला-आप हँसते क्या हैं, क्या समझ रखा है कि अंधे की जमीन सहज ही में मिल जाएगी? इस धोखे में न रहिएगा।
प्रभु सेवक को अब क्रोध आया। पहले उन्होंने समझा था, नायकराम दिल्लगी कर रहा है। अब मालूम हुआ कि वह सचमुच लड़ने पर तैयार है। बोले-इस
यह व्यवस्था कर दी है; आज से मैं मूर्ति-पूजा की कायल हो गई। लेखक ने इसे वैज्ञानिक सिध्दांतों से सिध्द किया है, यहाँ तक कि मूर्तियों का आकार-प्रकार भी वैज्ञानिक नियमों ही के आधार पर अवलम्बित बतलाया है।
इंदु-मेरे लिए बुलावा आ गया। तीसरे दिन चली जाऊँगी।
सोफ़िया-यह तो तुमने बुरी खबर सुनाई, फिर मैं यहाँ कैसे रहूँगी?
इस वाक्य में सहानुभूति नहीं, केवल स्वहित था। किंतु इंदु ने इसका आशय यह समझा कि सोफी को मेरा वियोग असह्य होगा। बोली-तुम्हारा जी तो किताबों में बहल