जगधार-नहीं सरकार, खून हो जाएगा।

सहसा भैरों सिर पर ताड़ी का घड़ा रखे आता हुआ दिखाई दिया। जगधार ने तुरंत खोंचा उठाया, बिना पैसे लिए कदम बढ़ाता हुआ दूसरी तरफ चल दिया। भैरों ने समीप आकर सलाम किया। प्रभु सेवक ने ऑंखें दिखाकर पूछा-तू ही भैरों ताड़ीवाला है न?

भैरों-(काँपते हुए) हाँ हुजूर, मेरा ही नाम भैरों है।

प्रभु सेवक-तू यहाँ लोगों के घरों में आग लगाता फिरता है?

भैरों-हुजूर, जवानी की कसम खाता हूँ, किसी ने हुजूर से झूठ कह दिया है।

प्रभु सेवक-तू कल मेरे गोदाम पर फौजदारी करने में शरीक था?

भैरों-हुजूर का ताबेदार हूँ, आपसे फौजदारी करूँगा। मुंसीजी से पूछिए, झूठ कहता हूँ या सच। सरकार, न जाने क्यों सारा मोहल्ला मुझसे दुश्मनी करता है। अपने घर में एक रोटी खाता हूँ, वह भी लोगों से नहीं देखा जाता। यह जो अंधा है, हुजूर, एक ही बदमास


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दोष है; उनका विचारक्षेत्र परिमित है, उनमें विचार-स्वातंत्रय का सम्मान करने की क्षमता ही नहीं, मैं व्यर्थ उनसे रुष्ट हो रही हूँ। यही एक काँटा था, जो उसके अंतस्तल में सदैव खटकता रहता था। जब वह निकल गया, तो चित्ता शांत हो गया। उसका जीवन धर्म-ग्रंथों के अवलोकन और धर्म-सिध्दांतों के मनन तथा चिंतन में व्यतीत होने लगा। अनुराग अंतर्वेदना की सबसे उत्ताम औषधि है।

किंतु इस मनन और अवलोकन से उसका चित्ता शांत होता हो, यह बात न थी। नाना प्रकार की शंकाएँ नित्य


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