सेवक का जी ललचा गया। खोंचा उतारने को कहा और कचालू, दही-बड़े, फुलौड़ियाँ खाने लगे। भूख लगी हुई थी। ये चीजें बहुत प्रिय लगीं। कहा-सूरदास ने तो यह बात मुझसे नहीं कही?
जगधार-वह कभी न कहेगा। कोई गला भी काट ले, तो शिकायत न करेगा।
प्रभुसेवक-तब तो वास्तव में कोई महापुरुष है। कुछ पता न चला, किसने झोंपड़े में आग लगाई थी?
जगधार-सब मालूम हो गया, हुजूर, पर किया क्या जाए। कितना कहा गया कि उस पर थाने में रपट कर दे, मुआ कहता है, कौन किसी को फँसाए! जो कुछ भाग में लिखा था, वह हुआ। हुजूर, सारी करतूत इसी भैरों ताड़ीवाले की है।
प्रभु सेवक-कैसे मालूम हुआ? किसी ने उसे आग लगाते देखा?
जगधार-हुजूर, वह खुद मुझसे कह रहा था। रुपयों की थैली लाकर दिखाई। इससे बढ़कर और क्या सबूत होगा?
प्रभु सेवक-भैरों के मुँह पर कहोगे?
की जाती है; गिर जाए, तो उसे छोड़ दिया जाता है। सोफी को जब ज्ञात हुआ कि इन लोगों को मेरी सब बातें मालूम हो गईं तो उसने परदा रखने की चेष्टा करनी छोड़ दी; धर्म-ग्रंथों के अधययन में डूब गई। पुरानी कुदूरतें दिल से मिटने लगीं। माता के कठोर वाक्य-बाणों का घाव भरने लगा। वह संकीर्णता, जो व्यक्तिगत भावों और चिंताओं को अनुचित महत्व दे देती है, इस सेवा और सद्व्यवहार के क्षेत्र में आकर तुच्छ जान पड़ने लगी। मन ने कहा, यह मामा के दोष नहीं, उनकी धार्मिक अनुदारता का