सुभागी-तुमने थैली देखी है?
जगधार-हाँ, देखी नहीं तो क्या झूठ बोल रहा हूँ?
सुभागी-सूरदास, सच-सच बता दो, रुपये तुम्हारे हैं!
सूरदास-पागल हो गई है क्या? इनकी बातों में आ जाती है! भला मेरे पास रुपये कहाँ से आते?
जगधार-इनसे पूछ, रुपये न थे, तो इस घड़ी राख बटोरकर क्या ढूँढ़ रहे थे?
सुभागी ने सूरदास के चेहरे की तरफ अन्वेषण की दृष्टि से देखा। उसकी उस बीमार की-सी दशा थी, जो अपने प्रियजनों की तस्कीन के लिए अपनी असह्य वेदना को छिपाने का असफल प्रयत्न कर रहा हो। जगधार के निकट आकर बोली-रुपये जरूर थे, इसका चेहरा कहे देता है।
जगधार-मैंने थैली अपनी ऑंखों से देखी है।
सुभागी-अब चाहे वह मुझे मारे या निकाले, पर रहूँगी उसी के घर। कहाँ-कहाँ थैली को छिपाएगा? कभी तो मेरे हाथ लगेगी। मेरे ही कारण इस पर यह बिपत पड़ी है। मैंने
नायकराम की निगाह में सूरदास का इतना आदर कभी न हुआ था। बोले-हुजूर, उस जन्म का कोई बड़ा भारी महात्मा है।
राजा साहब-उस जन्म का नहीं, इस जन्म का महात्मा है।
सच्चा दानी प्रसिध्दि का अभिलाषी नहीं होता। सूरदास को अपने त्याग और दान के महत्व का ज्ञान ही न था। शायद होता, तो स्वभाव में इतनी सरल दीनता न रहती, अपनी प्रशंसा कानों को मधुर लगती है। सभ्य दृष्टि में दान का यही सर्वोत्ताम पुरस्कार है। सूरदास का दान पृथ्वी या आकाश का दान था, जिसे स्तुति या कीर्ति