बजरंगी-कैसे जाओगे? देखते नहीं हो, यहाँ तक लपटें आ रही हैं!
जगधार-सूरे, क्या आज चूल्हा ठंडा नहीं किया था?
नायकराम-चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुसमनों का कलेजा कैसे ठंडा होता।
जगधार-पंडाजी, मेरा लड़का काम न आए, अगर मुझे कुछ भी मालूम हो। तुम मुझ पर नाहक सुभा करते हो।
नायकराम-मैं जानता हूँ जिसने लगाई है। बिगाड़ न दूँ, तो कहना।
ठाकुरदीन-तुम क्या बिगाड़ोगे, भगवान आप ही बिगाड़ देंगे। इसी तरह जब मेरे घर में चोरी हुई थी, तो सब स्वाहा हो गया।
जगधार-जिसके मन में इतनी खुटाई हो, भगवान उसका सत्यानाश कर दें।
सूरदास-अब तो लपट नहीं आती।
बजरंगी-हाँ, फूस जल गया, अब धारन जल रही है।
सूरदास-अब तो अंदर जा सकता हूँ?
नायकराम-अंदर तो जा सकते हो; पर बाहर नहीं निकल सकते। अब चलो आराम से सो रहो; जो होना था, हो गया। पछताने से क्या होगा?
देते। जब से मि. जॉन सेवक की शरण आए थे, एक प्रकार से उनके सुदिन आ गए थे; कल की चिंता सिर पर सवार न रहती थी। माहिर अली की उम्र पंद्रह से अधिक हो गई थी। अब सारी आशाएँ उसी पर अवलम्बित थीं। सोचते, जब माहिर मैट्रिक पास हो जाएगा, तो साहब से सिफारिश कराके पुलिस में भरती करा दूँगा। पचास रुपये से क्या कम वेतन मिलेगा! हम दोनों भाइयों की आय मिलाकर 80 रुपये हो जाएगी। तब जीवन का कुछ आनंद मिलेगा। तब तक जाहिर अली भी हाथ-पैर सम्भाल