जगधार-क्या ताकते हो भैरों, ले पड़ो।
सूरदास-मैं नहीं लड़ता।
नायकराम-सूरदास, देखो, नाम-हँसाई मत कराओ। मर्द होकर लड़ने से डरते हो? हार ही जाओगे या और कुछ!
सूरदास-लेकिन भाई, मैं पेंच-पाच नहीं जानता। पीछे से यह न कहना, हाथ क्यों पकड़ा। मैं जैसे चाहूँगा, वैसे लड़ूँगा।
जगधार-हाँ-हाँ, तुम जैसे चाहना, वैसे लड़ना।
सूरदास-अच्छा तो आओ, कौन आता है!
नायकराम-अंधे आदमी का जीवट देखना। चलो भैरों, आओ मैदान में।
भैरों-अंधे से क्या लड़ूँगा!
नायकराम-बस, इसी पर इतना अकड़ते थे?
जगधार-निकल आओ भैरों, एक झपट्टे में तो मार लोगे!
भैरों-तुम्हीं क्यों नहीं लड़ जाते, तुम्हीं इनाम ले लेना।
जगधार को रुपयों की नित्य चिंता रहती थी। परिवार बड़ा होने के कारण किसी तरह चूल न बैठती थी, घर में एक-न-एक चीज घटी ही रहती थी। धानोपार्जन के किसी उपाय को हाथ से न छोड़ना चाहता था। बोला-क्यों सूरे, हमसे लड़ोगे?
हो, पर मुझे तो यह भी विश्वास नहीं है। मेरे हृदय में उनके प्रति उतनी ही श्रध्दा है, जितनी किसी मामूली फकीर के प्रति। उसी प्रकार फकीर भी दान और क्षमा की महिमा गाता फिरता है, परलोक के सुखों का राग गाया करता है। वह भी उतना ही त्यागी, उतना ही दीन, उतना ही धर्मरत है। लेकिन इतना अविश्वास होने पर भी मैं रविवार को सौ काम छोड़कर गिरजे अवश्य जाता हूँ। न जाने से अपने समाज में अपमान होगा, उसका मेरे व्यवसाय पर बुरा असर पड़ेगा। फिर अपने ही घर में अशांति