बजरंगी-तो औरत भी भाग जाएगी, लेकिन काबू में न आएगी?
नायकराम-बहुत अच्छी कही बजरंगी, बहुत पक्की कही, वाह-वाह! मार से भूत भागता है, तो औरत भी भाग जाएगी। अब तो कट गई तुम्हारी बात?
भैरों-बात क्या कट जाएगी, दिल्लगी है? चूने को जितना ही कूटो, उतना ही चिमटता है।
जगधार-ये सब कहने की बातें हैं। औरत अपने मन से बस में आती है, और किसी तरह नहीं।
नायकराम-क्यों बजरंगी, नहीं है कोई जवाब?
ठाकुरदीन-पंडाजी, तुम दोनों को लड़ाकर तभी दम लोगे; बिचारे अपाहिज आदमी के पीछे पड़े हो।
नायकराम-तुम सूरदास को क्या समझते हो, यह देखने ही में इतने दुबले हैं। अभी हाथ मिलाओ, तो मालूम हो। भैरों, अगर इन्हें पछाड़ दो, तो पाँच रुपये इनाम दूँ।
भैरों-निकल जाओगे।
नायकराम-निकलनेवाले को कुछ कहता हूँ। यह देखो, ठाकुरदीन के हाथ में रखे देता हूँ।
के सम्बंध को भलीभाँति समझते हो; पर अब ज्ञात हुआ कि सोफी और अपनी माता की भाँति तुम भी भ्रम में पड़े हुए हो। क्या तुम समझते हो कि मैं और मुझ-जैसे और हजारों आदमी, जो नित्य गिरजे आते हैं, भजन गाते हैं, ऑंखें बंद करके ईश-प्रार्थना करते हैं, धार्मानुराग में डूबे हुए हैं? कदापि नहीं। अगर अब तक तुम्हें नहीं मालूम है, तो अब मालूम हो जाना चाहिए कि धर्म केवल स्वार्थ-संगठन है। सम्भव है, तुम्हें ईसा पर विश्वास हो, शायद तुम उन्हें खुदा का बेटा या कम-से-कम महात्मा समझते