पीछे-पीछे भैरों भी वहीं पहुँचा। झोपड़े में घुसा और चाहता था कि सुभागी का हाथ पकड़कर खींच ले कि सूरदास उठकर खड़ा हो गया और बोला-क्या बात है भैरों, इसे क्यों मार रहे हो?
भैरों गर्म होकर बोला-द्वार पर से हट जाओ, नहीं तो पहले तुम्हारी हड्डीयां तोड़ूँगा, सारा बगुलाभगतपन निकल जाएगा। बहुत दिनों से तुम्हारा रंग देख रहा हूँ, आज सारी कसर निकाल लूँगा।
सूरदास-मेरा क्या छैलापन तुमने देखा? बस, यही न कि मैंने सुभागी को घर से निकाल नहीं दिया?
भैरों-बस, अब चुप ही रहना। ऐसे पापी न होते, तो भगवान् ने ऑंखें क्यों फोड़ दी होतीं। भला चाहते हो, तो सामने से हट जाओ।
सूरदास-मेरे घर में तुम उसे न मारने पाओगे; यहाँ से चली जाए, तो चाहे जितना मार लेना।
भैरों-हटता है सामने से कि नहीं?
सूरदास-मैं अपने घर यह उपद्रव न मचाने दूँगा।
भैरों ने क्रोध में आकर
गाँठ हूँ, तो मैं मुँह के कालिख लगाकर क्यों न निकल जाऊँ। तुम और सोफी आराम से रहो, मेरा भी खुदा मालिक है।
जॉन सेवक-प्रभु, तुम मेरे सामने अपनी माँ का निरादर नहीं कर सकते।
प्रभु सेवक-खुदा न करे, मैं अपनी माँ का निरादर करूँ। लेनिक मैं दिखावे के धर्म के लिए अपनी आत्मा पर यह अत्याचार न होने दूँगा। आप लोगों की नाराजी के खौफ से अब तक मैंने इस विषय में कभी मुँह नहीं खोला। लेकिन जब देखता हूँ कि और किसी बात में तो धर्म की परवा नहीं की जाती, और