बचाकर उसे कुछ दे जाती, मिठुआ को अपने घर बुला ले जाती और उसे गुड़-चबेना खाने को देती।
भैरों ने कई बार उसे सूरदास के घर से निकलते देखा। जगधार ने दोनों को बातें करते हुए पाया। भैरों के मन में संदेह हो गया कि जरूर इन दोनों में कुछ साठ-गाँठ है, तभी से वह सूरदास से खार खाता था। उससे छेड़कर लड़ता। नायकराम के भय से उसकी मरम्मत न कर सकता था। सुभागी पर उसका अत्याचार दिनोंदिन बढ़ता जाता था और जगधार, शांत स्वभाव होने पर भी, भैरों का पक्ष लिया करता था।
जिस दिन बजरंगी और ताहिर अली में झगड़ा हुआ था, उसी दिन भैरों और सूरदास में संग्राम छिड़ गया। बुढ़िया दोपहर को नहाई थी सुभागी उसकी धोती छाँटना भूल गई। गरमी के दिन थे ही, रात को 9 बजे बुढ़िया को फिर गरमी मालूम र्हुई। गरमियों के दिनों में दो बार स्नान करती थी, जाड़ों में दो महीने
करेगा कि वह चिरकाल तक उनके आतिथ्य और सज्जनता का उपभोग करें। इन दो सप्ताहों में वह जितनी क्षीण हो गई है, उतनी महीनों बीमार रहकर भी न हो सकती थी। उसे संसार के सब सुख प्राप्त हैं; किंतु जैसे कोई शीतप्रधान देश का पौधा उष्ण देश में आकर अनेकों यत्न करने पर भी दिन-दिन सूखता जाता है, वैसी ही दशा उसकी भी हो गई है। उसे रात-दिन यही चिंता व्याप्त रहती है कि कहाँ जाऊँ, क्या करूँ? अगर आपने जल्द उसे वहाँ से बुला न लिया, तो आपको पछताना पड़ेगा। वह आजकल