वह मेरे बुझाए नहीं बुझ सकी। तुरंत अपने कमरे में आए, कपड़े पहने और उसी वक्त ताहिर अली के साथ पाँड़ेपुर चलने को तैयार हो गए। ग्यारह बज चुके थे, जमीन से आग की लपट निकल रही थी, दोपहर का भोजन तैयार था, मेज लगा दी गई थी; किंतु प्रभु सेवक माता ओर पिता के बहुत आग्रह करने पर भी भोजन पर न बैठे। ताहिर अली खुदा से दुआ कर रहे थे कि किसी तरह दोपहरी यहीं कट जाए, पंखे के नीचे टट्टियों से छनकर आने वाली शीतल वायु ने उनकी पीड़ा को बहुत शांत कर दिया था; किंतु प्रभु सेवक के हठ ने उन्हें यह आनंद न उठाने दिया।
अध्याय 11
भैरों पासी अपनी माँ का सपूत बेटा था। यथासाधय उसे आराम से रखने की चेष्टा करता रहता था। इस भय से कि कहीं बहू सास को भूखा न रखे, वह उसकी थाली अपने सामने परसा लिया करता था और उसे अपने साथ ही बैठाकर
ने इस मामले को जॉन सेवक क्+ी इच्छानुसार तय कर देने का वचन दिया, और मिस्टर सेवक अपनी सफलता पर फूले हुए घर आए।
स्त्री ने पूछा-क्या तय कर आए?
जॉन सेवक-वही, जो तय करने गया था।
स्त्री -शुक्र है, मुझे आशा न थी।
जॉन सेवक-यह सब सोफी के एहसान की बरकत है। नहीं तो यह महाशय सीधो मुँह से बात करनेवाले न थे। यह उसी के आत्मसमर्पण की शक्ति है, जिसने महेन्द्रकुमार सिंह जैसे अभिमानी और बेमुरौवत आदमी को नीचा दिखा दिया। ऐसे तपाक