और सफलता समानार्थक हैं। यह भ्रम है कि चित्रकार ही को रंगों की जरूरत होती है। अब तो तुम्हें निश्चय हो गया कि वह जमीन मिल जाएगी?
जॉन सेवक-जी हाँ, अब कोई संदेह नहीं।
यह कहकर उन्होंने प्रभु सेवक को पुकारा और तिरस्कार करके बोले-बैठे-बैठे क्या कर रहे हो? जरा पाँड़ेपुर क्यों नहीं चले जाते? अगर तुम्हारा यही हाल रहा, तो मैं कहाँ तक तुम्हारी मदद करता फिरूँगा।
प्रभु सेवक-मुझे जाने में कोई आपत्ति नहीं; पर इस समय मुझे सोफी के पास जाना है।
जॉन सेवक-पाँड़ेपुर से लौटते हुए सोफी के पास बहुत आसानी से जा सकते हो।
प्रभु सेवक-मैं सोफी से मिलना ज्यादा जरूरी समझता हूँ।
जॉन सेवक-तुम्हारे रोज-रोज मिलने से क्या फायदा, जब तुम आज तक उसे घर लाने में सफल नहीं हो सके?
प्रभु सेवक के मुँह से ये शब्द निकलते-निकलते रह गए-मामा ने जो आग लगा दी है,
रखना पड़ा। यह जानते हुए कि मिस सोफिया ने उनके एक निकटतम सम्बंधी की प्राण्ा-रक्षा की है, यह जानते हुए कि जॉन सेवक के साथ सद्व्यवहार करना कुँवर भरतसिंह को एक भारी ऋण से मुक्त कर देगा, वह इस प्रस्ताव की अवहेलना न कर सकते थे। कृतज्ञता हमसे वह सब कुछ करा लेती है, जो नियम की दृष्टि से त्याज्य है। यह वह चक्की है, जो हमारे सिध्दांतों और नियमों को पीस डालती है। आदमी जितना ही नि:स्पृह होता है, उपकार का बोझ उसे उतना ही असह्य होता है। राजा साहब