जॉन सेवक-बस, यही बात है, वे लोग मुझे वहाँ से निकाल देना चाहते हैं। अगर रिआयत की गई, तो मेरे गोदाम में जरूर आग लग जाएगी।
महेंद्रकुमार-मैं खूब समझ रहा हूँ। यों मैं स्वयं जनवादी हूँ और उस नीति का हृदय से समर्थन करता हूँ; पर जनवाद के नाम पर देश में जो अशांति फैली हुई है, उसका मैं घोर विरोधी हूँ। ऐसे जनवाद से तो धानवाद, एकवाद, सभी वाद अच्छे हैं। आप निश्चिंत रहिए।
इसी भाँति कुछ देर और बातें करके राजा साहब को खूब भरकर जॉन सेवक विदा हुए। रास्ते में ताहिर अली सोचने लगे-साहब को मेरी दुर्गति से अपना स्वार्थ सिध्द करने में जरा भी संकोच नहीं हुआ। क्या ऐसे धानी-मानी, विशिष्ट, विचारशील विद्वान् प्राणी भी इतने स्वार्थ-भक्त होते हैं!
जॉन सेवक अनुमान से उनके मन के भाव ताड़ गए। बोले-आप सोच रहे होंगे, मैंने बातों इतना रंग क्यों भरा, केवल
इन लोगों के दिमाग को कुछ न पूछिए। संसार इनके उपयोग के लिए है। और किसी को इसमें जीवित रहने का भी अधिकार नहीं है। जो प्राणी इनके द्वारा पर अपना मस्तक न घिसे, वह अपवादी है, अशिष्ट है, राजद्रोही है; और जिस प्राणी में राष्ट्रीयता का लेश-मात्रा भी आभास हो-विशेषत: वह जो यहाँ कला-कौशल और व्यवसाय को पुनर्जीवित करना चाहता हो, दंडनीय है। राष्ट्र-सेवा इनकी दृष्टि में सबसे अधाम पाप है। आपने मेरे सिगरेट के कारखाने की नियमावली तो देखी होगी?
महेंद्र-जी हाँ, देखी थी।