जॉन सेवक-किवाड़ तोड़ना चाहते थे, मगर चमारों ने धामकाया तो हट गए।
महेंद्रकुमार-कमीने! स्त्रियों पर अत्याचार करना चाहते थे!
जॉन सेवक-यही तो इस ड्रामा का सबसे लज्जास्पद अंश हैं।
महेंद्रकुमार-लज्जास्पद नहीं महाशय, घृणास्पद कहिए।
जॉन सेवक-अब यह बेचारे कहते हैं कि या तो मेरी इस्तीफा लीजिए, या गोदाम की रक्षा के लिए चौकीदारों का प्रबंध कीजिए। स्त्रियाँ इतनी भयभीत हो गई हैं कि वहाँ एक क्षण भी नहीं रहना चाहतीं। यह सारा उपद्रव उसी अंधे की बदौलत हो रहा है।
महेंद्रकुमार-मुझे तो वह बहुत गरीब, सीधा-सा आदमी मालूम होता है; मगर है छँटा हुआ। उसी की दीनता पर तरस खाकर मैंने निश्चय किया था कि आपके लिए कोई दूसरी जमीन तलाश करूँ। लेकिन जब उन लोगों ने शरारत पर कमर बाँधी है और आपको जबरदस्ती वहाँ से हटाना चाहते हैं, तो इसका उन्हें अवश्य दंड मिलेगा।
को सिध्द कर दिया। राजा साहब की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए इससे सुलभ और कोई उपाय नहीं था। राजा साहब को अधिकारियों से यही शिकायत थी, इसी कारण उन्हें अपने कार्यों के सम्पादन में कठिनाई पड़ती थी, विलम्ब होता था, बाधाएँ उपस्थित होती थीं। बोले-यह मेरा दुर्भाग्य है कि हुक्काम मुझ पर इतना अविश्वास करते हैं। मेरा अगर कोई अपराध है, तो इतना ही कि जनता के लिए भी स्वास्थ्य और सुविधाओं को उतना ही आवश्यक समझता हूँ, जितना हुक्काम और रईसों के लिए।
मिस्टर सेवक-महाशय,