अपने विचार से हजरत ईसा की शरण में आकर, वह हिंदुस्तानियों के अवगुणों से मुक्त हो चुकी थीं। उनके विचार में यहाँ के आदमियों को खुदा ने सज्जनता, सहृदयता, उदारता, शालीनता आदि दिव्य गुणों से सम्पूर्णत: वंचित रक्खा है। वह योरपीय सभ्यता की भक्त थीं और आहार-विहार में उसी का अनुसरण करती थीं; खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन, सब अंगरेजी थी; मजबूरी केवल अपने साँवले रंग से थी। साबुन के निरंतर प्रयोग और अन्य रासायनिक पदार्थों का व्यवहार करने पर भी मनोकामना पूरी होती न थी। उनके जीवन की एकमात्र यही अभिलाषा थी कि हम ईसाइयों की श्रेणी से निकलकर अंगरेजों में जा मिलें, हमें लोग साहब समझें, हमारा रब्त-जब्त अंगरेजों से हो, हमारे लड़कों की शादियाँ ऐंग्लो इंडियन या कम-से-कम उच्च श्रेणी के यूरोपियन लोगों से हों। सोफी की शिक्षा-दीक्षा अंगरेजी ढंग पर हुई थी; किंतु वह माता के
करने का अभियोग चलाने की बहुत कम जरूरत पड़ती थी। उनका प्रभाव और सद्भाव कठोर नीति को दबाए रखता था। वह अत्यंत मितभाषी थे। वृध्दावस्था में मौन विचार-प्रौढ़ता का द्योतक होता है, और युवावस्था में विचार-दारिद्रय का; लेकिन राजा साहब का वाक्-संयम इस धारणा को असत्य सिध्द करता था। उनके मुँह से जो बात निकलती थी, विवेक और विचार से परिष्कृत होती थी। एक ऐश्वर्यशाली ताल्लुकदार होने पर भी उनकी प्रवृत्ति साम्यवाद की ओर थी। सम्भव है, यह उनके राजनीतिक सिध्दांतों का फल