सूरदास-हाँ वहीं, बहुत लालच देते रहे, पर मैंने हामी नहीं भरी।
सूरदास ने सोचा था, अभी किसी से यह बात न कहूँगा, पर इस समय दूध लेने के लिए खुशामद जरूरी थी। अपना त्याग दिखाकर सुर्खरू बनना चाहता था।
बजरंगी-तुम हामी भरते, तो यहाँ कौन उसे छोड़े देता था। तीन-चार गाँवों के बीच में वही तो जमीन है। वह निकल जाएगी, तो हमारी गायें और भैंसें कहाँ जाएँगी?
जमुनी-मैं तो इन्हीं के द्वार पर सबको बाँध आती।
सूरदास-मेरी जान निकल जाए, तब तो बेचूँ ही नहीं, हजार-पाँच सौ की क्या गिनती। भौजी, एक घूँट दूध हो तो दे दो। मिठुआ खाने बैठा है। रोटी और गुड़ छूता ही नहीं, बस, दूध-दूध की रट लगाए हुए है। जो चीज घर में नहीं होती, उसी के लिए जिद करता है। दूध न पाएगा तो बिना खाए ही सो रहेगा।
बजरंगी-ले जाओ, दूध का कौन अकाल है। अभी दुहा है। घीसू की माँ, एक कुल्हिया दूध दे दे सूरे को।
दो, देखो, क्या कहता है। अगर जरा भी भुन-भुनाया, तो हंटर से बातें करूँगा। सारा वैराग भूल जाएगा। माँगता है भीख धोले-धोले के लिए मीलों कुत्तों की तरह दौड़ता है, उस पर दावा यह है कि वैरागी हूँ। (कोचवान से) गाड़ी फेरो, क्लब होते हुए बँगले चलो।
सोफ़िया-मामा, कुछ तो जरूर दे दो, बेचारा आशा लगाकर इतनी दूर दौड़ा आया था।
प्रभु सेवक-ओहो, मुझे तो पैसे भुनाने की याद ही न रही।
जॉन सेवक-हरगिज नहीं, कुछ मत दो, मैं इसे वैराग का सबक देना चाहता हूँ।