ताहिर-(बात बदलकर) इन मुजियों की जब तक अच्छी तरह तंबीह न हो जाएगी, शरारत से बाज न आएँगे।
कुल्सूम-सारी शरारत इसी माहिर की थी। लड़कों में लड़ाई-झगड़ा होता ही रहता है। यह वहाँ न जाता तो क्यों मुआमला इतना तूल खींचता? इस पर जो अहीर के लौंडे ने जरा दाँत काट लिया, तो तुम भन्ना उठे।
ताहिर-मुझे तो खून के छींटे देखते ही जैसे सिर पर भूत सवार हो गया।
इतने में घीसू की माँ जमुनी आ पहुँची। जैनब ने उसे देखते ही तुरंत बुला लिया और डाँटकर कहा-मालूम होता है, तेरी शामत आ गई है।
जमुनी-बेगम साहब, शामत नहीं आई है, बुरे दिन आए हैं, और क्या कहूँ। मैं कल ही दही बेचकर लौटी, तो यह हाल सुना। सीधो आपकी खिदमत में दौड़ी; पर यहाँ बहुत-से आदमी जमा थे, लाज के मारे लौट गई। आज दही बेचने नहीं गई। बहुत डरते-डरते आई हूँ।
जैनब-तो कौन हमारे ऊपर नालिश करने जाता है।
ताहिर अली खाना खाकर लेटे थे कि जैनब ने जाकर कहा-साहब दूसरों की जमीन क्यों लिए लेते हैं? बेचारे रोते फिरते हैं।
ताहिर-मुफ्त थोड़े ही लेना चाहते हैं! उसका माकूल मुआवजा देने पर तैयार हैं।
जैनब-यह तो गरीबों पर जुल्म है।
रकिया-जुल्म ही नहीं है, अजाब है। भैया, तुम साहब से साफ-साफ कह दो, मुझे इस अजाब में न डालिए। खुदा ने मेरे आगे भी बाल-बच्चे दिए हैं, न जाने कैसी पड़े, कैसी न पड़े; मैं यह अजाब सिर पर न लूँगा।