को भेजकर डॉक्टर को क्यों नहीं बुला लेते? कहीं हड़डी पर जरब न आ गया हो।
ताहिर-हाँ, मुझे भी ऐसा ही खौफ होता है, मगर डॉक्टर को बुलाऊँ तो उसकी फीस के रुपये कहाँ से आवेंगे?
कुल्सूम-तनख्वाह तो अभी मिली थी, क्या इतनी जल्द खर्च हो गई?
ताहिर-खर्च तो नहीं हो गई, लेकिन फीस की गुंजाइश नहीं है। अबकी माहिर की तीन महीने की फीस देनी होगी। 12 रुपये तो फीस ही के निकल जाएँगे, सिर्फ 18 रुपये बचेंगे! अभी तो पूरा महीना पड़ा हुआ है। क्या फाके करेंगे?
कुल्सूम-जब देखो, माहिर की फीस का तकाजा सिर पर सवार रहता है। अभी दस दिन हुए, फीस दी नहीं गई?
ताहिर-दस दिन नहीं हुए, एक महीना हो गया।
कुल्सूम-फीस अबकी न दी जाएगी। डॉक्टर की फीस उनकी फीस से जरूरी है। वह पढ़कर रुपये कमाएँगे, तो मेरे घर न भरेंगे। मुझे तो तुम्हारी ही जान का भरोसा है।
गईं। मैं दो आने लेती, और वे खुशी से देते। यही अहीर पूरे सौ गिनकर जाता। बेसब्री से गरजमंद चौकन्ना हो जाता है। समझता है, शायद हमें बेवकूफ बना रही हैं जितनी ही देर लगाओ, जितनी बेरुखी से काम लो, उतना एतबार बढ़ता है।
रकिया-क्या करूँ बहन, मैं डरती हूँ कि कहीं बहुत सख्ती से निशाना खता न कर जाए।
जैनब-वह अहीर रुपये जरूर लाएगा। ताहिर को आज ही से भरना शुरू कर दो। बस, अजाब का खौफ दिलाना चाहिए। उन्हें हत्थे चढ़ाने का यही ढंग है।
रकिया-और कहीं साहब न माने, तो?