है! वहाँ वह अहीर का लौंडा हमारे लड़कों का खून-खच्चर किए डालता है। मुए को पकड़ पाती, तो खून ही चूस लेती।
रकिया-मुआ आदमी है कि देव-बच्चा है! माहिर के हाथ में इतनी जोर से दाँत काटा है कि खून के फौवारे निकल रहे हैं। कोई दूसरा मर्द होता, तो इसी बात पर मुए को जीता गाड़ देता।
जैनब-कोई अपना होता, तो इस वक्त मूड़ीकाटे को कच्चा ही चबा जाता।
ताहिर अली घबराकर मैदान की ओर दौड़े। माहिर के कपड़े खून से तर देखे, तो जामे से बाहर हो गए। घीसू के दोनों कान पकड़कर जोर से हिलाए और तमाचे-पर-तमाचे लगाने शुरू किए। मिठुआ ने देखा, अब पिटने की बारी आई; मैदान हमारे हाथ से गया, गालियाँ देता हुआ भागा। इधार घीसू ने भी गालियाँ देनी शुरू कीं। शहर के लौंडे गाली की कला में सिध्दहस्त होते हैं। घीसू नई-नई अछूती गालियाँ दे रहा था और ताहिर अली गालियों का
पर रखी, और चले। बजरंगी ने कहा-मैं जरा गोरुओं को देखने जाता हूँ, उधार से होता हुआ आऊँगा। यों बड़ा अक्खड़ आदमी था, नाक पर मक्खी न बैठने देता। सारा मुहल्ला उसके क्रोध से काँपता था, लेकिन कानूनी कारवाइयों से डरता था। पुलिस और अदालत के नाम ही से उसके प्राण सूख जाते थे। नायकराम को नित्य ही अदालत से काम रहता था, वह इस विषय में अभ्यस्त थे। बजरंगी को अपनी जिंदगी में कभी गवाही देने की भी नौबत न आई थी। नायकराम के चले आने के बाद ताहिर अली भी