विनय-इंदु से मिलने जाना है।
जाह्नवी-कोई जरूरत नहीं। मिलने-भेंटने की प्रथा स्त्रियों के लिए है, पुरुषों के लिए नहीं, जाओ।
विनय को फिर कुछ कहने की हिम्मत न हुई, आहिस्ता से उठे और चले गए।
सोफी ने साहस करके कहा-आजकल तो राजपूताने में आग बरसती होगी!
जाह्नवी ने निश्चयात्मक भाव से कहा-र्
कर्तव्य कभी आग और पानी की परवा नहीं करता। जाओ, तुम भी सो रहो, सवेरे उठना है।
सोफी सारी रात बैठी रही। विनय से एक बार मिलने के लिए उसका हृदय तड़फड़ा रहा था-आह! वह कल चले जाएँगे, और मैं उनसे विदा भी न हो सकूँगी। वह बार-बार खिड़की से झाँकती कि कहीं विनय की आहट मिल जाए। छत पर चढ़कर देखा; अंधकार छाया हुआ था, तारागण उसकी आतुरता पर हँस रहे थे। उसके जी में कई बार प्रबल आवेग हुआ कि छत पर से नीचे बाग में कूद पड़ूँ,
सूरदास ने गर्व से उत्तर दिया-खाँ साहब, अगर जमीन जाएगी, तो इसके साथ मेरी जान भी जाएगी।
यह कहकर उसने लकड़ी सँभाली और अपने अव्े पर आ बैठा।
उधार दयागिरि ने जाकर नायकराम से यह समाचार कहा। बजरंगी भी बैठा था। यह खबर सुनते ही दोनों के होश उड़ गए। सूरदास के बल पर दोनों उछलते रहे, उस दिन ताहिर अली से कैसी बातें कीं, और आज सूरदास ने ही धोखा दिया। बजरंगी ने चिंतित होकर कहा-अब क्या करना होगा पंडाजी, बताओ?
नायकराम-करना