है, पर बिना विनय की ओर देखे ही उसे दिव्य ज्ञान-सा हो जाता था कि अब वह मेरी ओर ताक रहे हैं, और तत्क्षण उसका मन अस्थिर हो जाता। जाह्नवी ने कई बार टोका-सोती तो नहीं हो? क्या बात है, रुक क्यों जाती हो? आज तुझे क्या हो गया है बेटी? सहसा उनकी दृष्टि विनयसिंह की ओर फिरी-उसी समय जब वह प्रेमातुर नेत्रों से उसकी ओर ताक रहे थे। जाह्नवी का विकसित, शांत मुख-मंडल तमतमा उठा, मानो बाग में आग लग गई। अग्निमय नेत्रों से विनय की ओर देखकर बोलीं-तुम कब जा रहे हो?
विनयसिंह-बहुत जल्द।
जाह्नवी-मैं बहुत जल्द का आशय यह समझती हूँ कि तुम कल प्रात:काल ही प्रस्थान करोगे।
विनयसिंह-अभी साथ जानेवाले कई सेवक बाहर गए हुए हैं।
जाह्नवी-कोई चिंता नहीं। वे पीछे चले जाएँगे, तुम्हें कल प्रस्थान करना होगा।
विनयसिंह-जैसी आज्ञा।
जाह्नवी-अभी जाकर सब आदमियों को सूचना दे दो। मैं चाहती हूँ कि तुम स्टेशन पर सूर्य के दर्शन करो।
सूरदास की जिद से ताहिर अली को क्रोध आ गया। बोले-तुम्हारी तकदीर में भीख माँगना लिखा है, तो कोई क्या कर सकता है। इन बड़े आदमियों से अभी पाला नहीं पड़ा है। अभी खुशामद कर रहे हैं, मुआवजा देने पर तैयार हैं; लेकिन तुम्हारा मिजाज नहीं मिलता, और वही जब कानूनी दाँव-पेंच खेलकर जमीन पर कब्जा कर लेंगे, दो-चार सौ रुपये बरायनाम मुआवजा दे देंगे, तो सीधो हो जाओगे। मुहल्लेवालों पर भूले बैठे हो। पर देख लेना, जो कोई पास भी फटके। साहब यह जमीन लेंगे जरूर, चाहे खुशी से दो, चाहे रोकर।