लिए मैं इतने दिनों तक शांत भाव से धैर्य धारण किए हुए मन में तप कर रही थी। वह वरदान आज मुझे मिल गया है, तो यह मेरे लिए लज्जा की बात नहीं, आनंद की बात है।
प्रभु सेवक-धर्म-विरोध के होते हुए भी?
सोफ़िया-यह विचार उन लोगों के लिए है, जिनके प्रेम वासनाओें से युक्त होते हैं। प्रेम और वासना में उतना ही अंतर है, जितना कंचन और काँच में। प्रेम की सीमा भक्ति से मिलती है, और उनमें केवल मात्रा का भेद है। भक्ति में सम्मान और प्रेम में सेवाभाव का आधिाक्य होता है। प्रेम के लिए धर्म की विभिन्नता कोई बंधान नहीं है। ऐसी बाधाएँ उस मनोभाव के लिए हैं, जिसका अंत विवाह है, उस प्रेम के लिए नहीं, जिसका अंत बलिदान है।
प्रभु सेवक-मैंने तुम्हें जता दिया, यहाँ से चलने के लिए तैयार रहो।
सोफ़िया-मगर घर पर किसी से इसकी चर्चा करने की जरूरत नहीं।
प्रभु सेवक-इससे निश्चिंत रहो।
की निसानी है, भला मैं उसे बय या पट्टा कैसे कर सकता हूँ? मैंने उसे धरम काज के लिए संकल्प कर दिया है।
ताहिर-धरम काज बिना रुपये के कैसे होगा? जब रुपये मिलेंगे, तभी तो तीरथ करोगे, साधु-संतों की सेवा करोगे; मंदिर-कुऑं बनवाओगे?
चौधारी-सूरे, इस बखत अच्छे दाम मिलेंगे। हमारी सलाह तो यही है कि दे दो, तुम्हारा कोई उपकार तो उससे होता नहीं।
सूरदास-मुहल्ले-भर की गउएँ चरती हैं, क्ाय इससे पुन्न नहीं होता? गऊ की सेवा से बढ़कर और कौन पुन्न का काम है?