जब सोफ़िया चली गई, तो विनय ने प्रभु सेवक से कहा-मैं इस निर्णय को पहले ही से जानता था। तुम लज्जित तो न हुए होगे?
प्रभु सेवक-उसने तुम्हारी मुरौवत की है।
विनयसिंह-भाई, तुम बड़े अन्यायी हो। इतने युक्तिपूर्ण निर्णय पर भी उनके सिर इलजाम लगा ही दिया। मैं तो उनकी विचारशीलता का पहले ही से कायल था, आज से भक्त हो गया। इस निर्णय ने मेरे भाग्य का निर्णय कर दिया। प्रभु, मुझे स्वप्न में भी यह आशा न थी कि मैं इतनी आसानी से लालसा का दास हो जाऊँगा। मैं मार्ग से विचलित हो गया, मेरा संयम कपटी मित्र की भाँति परीक्षा के पहले ही अवसर पर मेरा साथ छोड़ गया। मैं भली भाँति जानता हूँ कि मैं आकाश के तारे तोड़ने जा रहा हूँ-वह फल खाने जा रहा हूँ, जो मेरे लिए वर्जित है। खूब जानता हूँ, प्रभु, कि मैं अपने जीवन को नैराश्य की वेदी पर बलिदान कर रहा हूँ। अपनी पूज्य
'ज्ञान-मान जहँ एकौ नाहीं, देखत ब्रह्म रूप सब गाहीं।'
इन झगड़ों में मत पड़ो।
सूरदास-बाबाजी, जब तक भगवान् की दया न होगी, भक्ति और वैराग्य किसी पर मन न जमेगा। इस घड़ी मेरा हृदय रो रहा है, उसमें उपदेश और ज्ञान की बातें नहीं पहुँच सकतीं। गीली लकड़ी खराद पर नहीं चढ़ती।
दयागिरि-पछताओगे और क्या।
यह कहकर दयागिरि अपनी राह चले गए। वह नित्य गंगा-स्नान को जाया करते थे।
उनके जाने के बाद सूरदास ने अपने मन में कहा-यह भी