सर्वथा असामयिक है। मेरे विचार में इससे समाज का उपकार नहीं हो सकता। इस समय हमारे कवियों कार् कर्तव्य है त्याग का महत्व दिखाना, ब्रह्मचर्य में अनुराग उत्पन्न करना, आत्मनिग्रह का उपदेश करना। दाम्पत्य तो दासत्व का मूल है और यह समय उसके गुण-गान के लिए अनुकूल नहीं है।
प्रभु सेवक-आपको जो कुछ कहना था, कह चुके?
विनयसिंह-अभी बहुत कुछ कहा जा सकता है। पर इस समय इतना ही काफी है।
प्रभु सेवक-मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि बलिदान और त्याग के आदर्श की मैं निंदा नहीं करता। वह मनुष्य के लिए सबसे ऊँचा स्थान है; और वह धान्य है, जो उसे प्राप्त कर ले। किंतु जिस प्रकार कुछ व्रतधारियों के निर्जल और निराहार रहने से अन्न और जल की उपयोगिता में बाधा नहीं पड़ती, उसी प्रकार दो-चार योगियों के त्याग से दाम्पत्य जीवन त्याज्य नहीं हो जाता। दाम्पत्य मनुष्य के सामाजिक
चला। गोदाम के सामने पहुँचा, तो दयागिरि से भेंट हो गई। उन्होंने पूछा-इधार कहाँ चले सूरदास? तुम्हारी जगह तो पीछे छूट गई।
सूरदास-जरा इन्हीं मियाँ साहब से कुछ बातचीत करनी है।
दयागिरि-क्या इसी जमीन के बारे में?
सूरदास-हाँ, मेरा विचार है कि यह जमीन बेचकर कहीं तीर्थयात्रा करने चला जाऊँ। इस मुहल्ले में अब निबाह नहीं है।
दयागिरि-सुना, आज भैरों तुम्हें मारने की धमकी दे रहा था।
सूरदास-मैं तरह न दे जाता, तो उसने मार ही दिया था। सारा मुहल्ला बैठा