ने इन्हीं भावों के अंतर्गत दाम्पत्य जीवन का ऐसा सुललित चित्र खींचा था कि उसमें प्रकाश, पुष्प और प्रेम का आधिाक्य था; कहीं अंधोरी घाटियाँ न थीं, जिनमें हम गिर पड़ते हैं; कहीं वे काँटे न थे, जो हमारे पैरों में चुभते हैं; कहीं वह विकार न था, जो हमें मार्ग से विचलित कर देता है। कविता समाप्त करके प्रभु सेवक ने विनयसिंह से कहा-अब आपको इसके विषय में जो कुछ कहना हो, कहिए।
विनयसिंह ने सकुचाते हुए उत्तर दिया-मुझे जो कुछ कहना था, कह चुका।
प्रभु सेवक-फिर से कहिए।
विनयसिंह-बार-बार वही बातें क्या कहूँ।
प्रभु सेवक-मैं आपके कथन का भावार्थ कर दूँ?
विनयसिंह-मेरे मन में एक बात आई, कह दी; आप व्यर्थ उसे इतना बढ़ा रहे हैं।
प्रभु सेवक-आखिर आप उन भावों को सोफी के सामने प्रकट करते क्यों शर्माते हैं?
विनयसिंह-शर्माता नहीं हूँ, लेकिन आपसे मेरा कोई विवाद
में उनका सराधा न किया, तो वे भी क्या समझेंगे कि मेरे वंश में कोई है! मेरे साथ तो कुल का अंत ही है। मैं यह रिन न चुकाऊँगा, तो और कौन लड़का बैठा हुआ है, जो चुका देगा? कौन उद्दम करूँ? किसी बड़े आदमी के घर पंखा खींच सकता हूँ, लेकिन यह काम भी तो साल भर में चार ही महीने रहता है, बाकी महीने क्या करूँगा? सुनता हूँ अंधे कुर्सी, मोढ़े, दरी, टाट बुन सकते हैं, पर यह काम किससे सीखूँ? कुछ भी हो, अब भीख न माँगूँगा।
चारों ओर से निराश होकर सूरदास के