जलते तवे की भाँति तप रही थीं। वहीं विनय कम्बल पर सिर झुकाए बैठे हुए थे। सोफी को देखते ही वह उठ खड़े हुए और उसके लिए कुर्सी लाने दौड़े।
सोफी-कहाँ जा रहे हैं?
प्रभु सेवक-(मुस्कराकर) तुम्हारे लिए कुर्सी लाने।
सोफी-वह कुर्सी लगाएँगे और मैं बैठूँगी! कितनी भद्दी बात है!
प्रभु सेवक-मैं रोकता भी, तो वह न मानते।
सोफी-इस कमरे में इनसे कैसे रहा जाता है?
प्रभु सेवक-पूरे योगी हैं। मैं तो प्रेम-वश चला आता हूँ।
इतने में विनय ने एक गद्देदार कुर्सी लाकर सोफी के लिए रख दी। सोफी संकोच और लज्जा से गड़ी जा रही थी। विनय की ऐसी दशा हो रही थी, मानो पानी में भीग रहे हैं। सोफी मन में कहती थी-कैसा आदर्श जीवन है! विनय मन में कहते थे-कितना अनुपम सौंदर्य है! दोनों अपनी-अपनी जगह खड़े रहे! आखिर विनय को एक उक्ति सूझी। प्रभु सेवक की ओर देखकर
इसलिए न है कि अंधा हूँ, भीख माँगता हूँ। मसक्कत की कमाई खाता होता, तो मैं भी गरदन उठाकर न चलता? मेरा भी आदर-मान होता; क्यों चिऊँटी की भाँति पैरों के नीचे मसला जाता! आज भगवान् ने अपंग न बना दिया होता, तो क्या दोनों आदमी लड़के को मारकर हँसते हुए चले जाते, एक-एक की गरदन मरोड़ देता। बजरंगी से क्यों नहीं कोई बोलता! घिसुआ ने भैरों की ताड़ी का मटका फोड़ दिया था, कई रुपये का नुकसान हुआ; लेकिन भैरों ने चूँ तक न की। जगधार को उसके मारे घर से निकलना