गई। पुरानी कुदूरतें दिल से मिटने लगीं। माता के कठोर वाक्य-बाणों का घाव भरने लगा। वह संकीर्णता, जो व्यक्तिगत भावों और चिंताओं को अनुचित महत्व दे देती है, इस सेवा और सद्व्यवहार के क्षेत्र में आकर तुच्छ जान पड़ने लगी। मन ने कहा, यह मामा के दोष नहीं, उनकी धार्मिक अनुदारता का दोष है; उनका विचारक्षेत्र परिमित है, उनमें विचार-स्वातंत्रय का सम्मान करने की क्षमता ही नहीं, मैं व्यर्थ उनसे रुष्ट हो रही हूँ। यही एक काँटा था, जो उसके अंतस्तल में सदैव खटकता रहता था। जब वह निकल गया, तो चित्ता शांत हो गया। उसका जीवन धर्म-ग्रंथों के अवलोकन और धर्म-सिध्दांतों के मनन तथा चिंतन में व्यतीत होने लगा। अनुराग अंतर्वेदना की सबसे उत्ताम औषधि है।
किंतु इस मनन और अवलोकन से उसका चित्ता शांत होता हो, यह बात न थी। नाना प्रकार की शंकाएँ नित्य उपस्थित होती रहती थीं-जीवन का उद्देश्य
कोई बात बढ़ाकर नहीं कही है। आकस्मिक बाधाओं को देखते हुए आप लाभ के अनुमान में कुछ और कमी कर सकते हैं।
कुँवर साहब-आखिर कहाँ तक?
जॉन सेवक-20 रुपये सैकड़े समझिए।
कुँवर साहब-और पहले वर्ष?
जॉन सेवक-कम-से-कम 15 रुपये प्रति सैकड़े।
कुँवर साहब-मैं पहले वर्ष 10 रुपये और उसके बाद 15 रुपये प्रति सैकड़े पर संतुष्ट हो जाऊँगा।
जॉन सेवक-तो फिर मैं आपसे यही कहूँगा कि हिस्से लेने में विलम्ब न करें। खुदा ने चाहा, तो आपको कभी निराशा न होगी।