जॉन सेवक-तुम इस वक्त अपने होश में नहीं हो, मैं तुमसे वाद-विवाद नहीं करना चाहता। पहले जाकर शांत हो जाओ, फिर मैं तुम्हें इसका उत्तर दूँगा।
प्रभु सेवक क्रोध से भरा हुआ अपने कमरे में आया और सोचने लगा कि क्या करूँ। यहाँ तक उसका सत्याग्रह शब्दों ही तक सीमित था, अब उसके क्रियात्मक होने का अवसर आ गया, पर क्रियात्मक शक्ति का उसके चरित्र में एकमात्र अभाव था। इस उद्विग्न दशा में वह कभी एक कोट पहनता, कभी उसे उतारकर दूसरा पहनता, कभी कमरे के बाहर चला जाता, कभी अंदर आ जाता। सहसा जॉन सेवक आकर बैठ गए, और गम्भीर भाव से बोले-प्रभु, आज तुम्हारा आवेश देखकर मुझे जितना दु:ख हुआ है, उससे कहीं अधिक चिंता हुई है। मुझे अब तक तुम्हारी व्यावहारिक बुध्दि पर विश्वास था; पर अब विश्वास उठ गया। मुझे निश्चय था कि तुम जीवन और धर्म के सम्बंध को भलीभाँति
मिसेज़ सेवक-खुदा तुझे इस अभक्ति की सज़ा देगा। मेरी उससे यही प्रार्थना है कि वह फिर मुझे तेरी सूरत न दिखाए।
यह कहकर मिसेज़ सेवक कमरे के बाहर निकल आईं। रानी और इंदु उधार से आ रही थीं। द्वार पर उनसे भेंट हो गई। रानीजी मिसेज़ सेवक के गले लिपट गई और कृतज्ञतापूर्ण शब्दों का दरिया बहा दिया। मिसेज़ सेवक को इस साधु प्रेम में बनावट की बू आई। लेकिन रानी को मानव-चरित्र का ज्ञान न था। इंदु से बोलीं-देख, मिस सोफ़िया से कह दे, अभी जाने की तैयारी