होने दूँगा। आप लोगों की नाराजी के खौफ से अब तक मैंने इस विषय में कभी मुँह नहीं खोला। लेकिन जब देखता हूँ कि और किसी बात में तो धर्म की परवा नहीं की जाती, और सारा धार्मानुराग दिखावे के धर्म पर ही किया जा रहा है, तो मुझे संदेह होने लगता है कि इसका तात्पर्य कुछ और तो नहीं!

जॉन सेवक-तुमने किस बात में मुझे धर्म के विरुध्द आचरण करते देखा?

प्रभु सेवक-सैकड़ों ही बातें हैं, एक हो तो कहूँ।

जॉन सेवक-नहीं, एक ही बतलाओ।

प्रभु सेवक-उस बेकस अंधे की जमीन पर, कब्जा करने के लिए आप जिन साधानों का उपयोग कर रहे हैं, क्या वे धर्मसंगत हैं? धर्म का अंत वहीं हो गया, जब उसने कहा दिया कि मैं अपनी जमीन किसी तरह न दूँगा। जब कानूनी विधानों से, कूटनीति से, धमकियों से अपना मतलब निकालना आपको धर्मसंगत मालूम होता हो; पर मुझे तो वह सर्वथा अधर्म और अन्याय ही प्रतीत होता है।


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मसीह का भक्त बनाना चाहती थी। इसके विरुध्द जब तुम्हें ईसू से मुँह मोड़ते देखती हूँ; उनके उपदेश, उनके जीवन और उनके अलौकिक कृत्यों पर शंका करते पाती हूँ, तो मेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं, और यही इच्छा होती है कि इसकी सूरत न देखूँ। मुझे अपना मसीह सारे सांसर से, यहाँ तक कि अपनी जान से भी प्यारा है।

सोफ़िया-आपको ईसू इतना प्यारा है, तो मुझे भी अपनी आत्मा, अपना ईमान उससे कम प्यारा नहीं है। मैं उस पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं सह सकती।


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