सूरदास स्थिति को भलीभाँति समझ गया। हृदय को क्लेश तो हुआ, पर बेपरवाही से बोला-मिस साहब, इसकी क्या चिंता? भगवान् तुम्हारा कल्याण करें। तुम्हारी दया चाहिए, मेरे लिए यही बहुत है।
सोफ़िया ने माँ से कहा-मामा, देखा आपने, इसका मन जरा भी मैला नहीं हुआ।
प्रभु सेवक-हाँ, दु:खी तो नहीं मालूम होता।
जॉन सेवक-उसके दिल से पूछो।
मिसेज़ सेवक-गालियाँ दे रहा होगा।
गाड़ी अभी धीरे-धीरे चल रही थी। इतने में ताहिर अली ने पुकारा-हुजूर, यह जमीन पंडा की नहीं, सूरदास की है। यह कह रहे हैं।
साहब ने गाड़ी रुकवा दी, लज्जित नेत्रों से मिसेज सेवक को देखा, गाड़ी से उतरकर सूरदास के पास आए, और नम्र भाव से बोले-क्यों सूरदास, यह जमीन तुम्हारी है?
सूरदास-हाँ हुजूर, मेरी ही है। बाप-दादों की इतनी ही तो निशानी बच रही है।
जॉन सेवक-तब तो मेरा काम बन गया।
मुलाजिमों का हक है! खूब! आपका हक तनख्वाह, इसके सिवा आपको कोई हक नहीं है।
ताहिर-हुजूर, अब आइंदा ऐसी गलती न होगी।
जॉन सेवक-अब तक आपने इस मद में जो रकम वसूल की है, वह आमदनी में दिखाइए। हिसाब-किताब के मामले में मैं जरा भी रिआयत नहीं करता।
ताहिर-हुजूर, बहुत छोटी रकम होगी।
जॉन सेवक-कुछ मुजायका नहीं, एक ही पाई सही; वह सब आपको भरनी पड़ेगी। अभी वह रकम छोटी है, कुछ दिनों में उसकी तादाद सैकड़ों तक पहुँच जाएगी।