प्रभु सेवक नित्य एक बार सोफिया से मिलने जाया करते था। कुँवर साहब और विनय, दोनों ही की विनयशीलता और शालीनता ने उसे मंत्र-मुग्धा कर दिया था। कुँवर साहब गुणज्ञ थे। उन्होंने पहले ही दिन, एक निगाह में ताड़ लिया कि वह साधारण बुध्दि का युवक नहीं है। उन पर शीघ्र ही प्रकट हो गया कि इसकी स्वाभाविक रुचि साहित्य-दर्शन की ओर है। वाणिज्य और व्यापार से इसे उतनी ही भक्ति है, जितनी विनय की जमींदारी से। इसलिए वह प्रभु सेवक से प्राय: साहित्य और काव्य आदि विषयों पर वर्तालाप किया करते थे। वह उसकी प्रवृत्तियों को राष्ट्रीयता के भावों से अलंकृत कर देना चाहते थे। प्रभु सेवक को भी ज्ञात हो गया कि यह महाशय काव्य-कला के मर्मज्ञ हैं। इनसे उसे वह स्नेह हो गया था, जो कवियों को रसिक जनों से हुआ करता है। उसने इन्हें अपनी कई काव्य-रचनाएँ सुनाई थीं, और उनकी उदार अभ्यर्थनाओं से


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करते हैं। देखूँ, यहाँ से जाती है, तो कौन-सा तोहफा दे देते हैं। कहाँ हैं तेरी रानी साहब? मैं भी उन्हें धन्यवाद दे दूँ। उनसे आज्ञा ले लो और घर चलो। पापा अकेले घबरा रहे होंगे।

सोफ़िया-वह तो तुमसे मिलने को बहुत उत्सुक थीं। कब की आ गई होतीं, पर कदाचित् हमारी बीच में बिना बुलाए आना अनुचित समझती होंगी।

प्रभु सेवक-मामा, अभी सोफी को यहाँ दो-चार दिन और आराम से पड़ी रहने दीजिए। अभी इसे उठने में कष्ट होगा। देखिए, कितनी दुर्बल हो गई है!

सोफ़िया-रानीजी भी यही कहती थीं कि अभी मैं तुम्हें जाने न दूँगी।


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