किस पर पड़ेगी? तुम भी तो गँवार आदमी हो, उनसे क्या कहने गए? ऐसी बातें मरदों से कहने की थोड़ी ही होती हैं। हमसे कहते, हम तय करा देते।
जाबिर की माँ का नाम था रकिया। वह भी आकर खड़ी हो गईं। दोनों महिलाएँ साये की तरह साथ-साथ रहती थीं। दोनों के भाव एक, दिल एक, विचार एक, सौतिन का जलापा नाम को न था। बहनों का-सा प्रेम था। बोली-और क्या, भला ऐसी बातें मरदों से की जाती हैं?
बजरंगी-माताजी, मैं गँवार आदमी, इसका हाल क्या जानूँ। अब आप ही तय करा दीजिए। गरीब आदमी हूँ, बाल-बच्चे जिएँगे।
जैनब-सच-सच कहना, यह मुआमला दब जाए, तो कहाँ तक दोगे?
बजरंगी-बेगम साहब, 50 रुपये तक देने को तैयार हूँ।
जैनब-तुम भी गजब करते हो, 50 रुपये ही में इतना बड़ा काम निकालना चाहते हो?
रकिया-(धीरे से) बहन, कहीं बिदक न जाए।
रहा हूँ। ऐसे मूँजी से पाला पड़ा है कि किसी तरह चंगुल में नहीं आता। देहातियों को जो लोग सरल कहते हैं, बड़ी भूल करते हैं। इनसे ज्यादा चालाक आदमी मिलना मुश्किल है। तुम्हें इस वक्त कोई काम नहीं है, मोटर मँगवाए देता हूँ, शान से चली जाओ, और उसे अपने साथ लेती आओ।
ईश्वर सेवक वहीं आराम-कुरसी पर ऑंखें बंद किए ईश्वर-भजन में मग्न बैठे थे। जैसे बहरा आदमी मतलब की बात सुनते ही सचेत हो जाता है, मोटरकार का जिक्र सुनते ही धयान टूट गया। बोले-मोटरकार