से और भी जिद पकड़ गया। सीधो गोदाम के बरामदे में जाकर रुका। इस समय यहाँ बहुत-से चमार जमा थे। खालों की खरीद हो रही थी। चौधारी ने कहा-आओ सूरदास, कैसे चले?
सूरदास इतने आदमियों के सामने अपनी इच्छा न प्रकट कर सका। संकोच ने उसकी जबान बंद कर दी। बोला-कुछ नहीं, ऐसे ही चला आया।
ताहिर-साहब इनसे पीछेवाली जमीन माँगते हैं, मुँह-माँगे दाम देने को तैयार हैं! पर यह किसी तरह राजी नहीं होते। उन्होंने खुद समझाया, मैंने कितनी मिन्नत की; लेकिन इनके दिल में कोई बात जमती ही नहीं।
लज्जा अत्यंत निर्लज्ज होती है। अंतिम काल में भी जब हम समझते हैं कि उसकी उलटी साँसें चल रही हैं, वह सहसा चैतन्य हो जाती है, और पहले से भी अधिकर् कर्तव्यशील हो जाती है। हम दुरावस्था में पड़कर किसी मित्र से सहायता की याचना करने को घर से निकलते हैं, लेकिन मित्र
मधुर सहानुभूति काफी से ज्यादा थी। अब सोफी को इंदु से अपने मनोभावों को गुप्त रखना मैत्री के नियमों के विरुध्द प्रतीत हुआ। करुण स्वर में बोली-इंदु, मेरा वश चलता तो कभी रानी के चरणों को न छोड़ती, पर अपना क्या काबू है? यह स्नेह और कहाँ मिलेगा?
इंदु यह भाव न समझ सकी। अपनी स्वाभाविक सरलता से बोली-कहीं विवाह की बातचीत हो रही है क्या?
उसकी समझ में विवाह के सिवा लड़कियों के इतना दु:खी होने का कोई कारण न था।
सोफिया-मैंने तो इरादा कर लिया है कि विवाह न करूँगी।