की गउएँ मारी-मारी फिरेंगी; फिरें, इसको मैं क्या करूँ? जब तक निभ सका, निभाया। अब नहीं निभता, तो क्या करूँ? जिनकी गायें चरती हैं, कौन मेरी बात पूछते हैं? आज कोई मेरी पीठ पर खड़ा हो जाता, तो भैरों मुझे रुलाकर यों मूँछों पर ताव देता हुआ न चला जाता। जब इतना भी नहीं है, तो मुझे क्या पड़ी है कि दूसरों के लिए मरूँ? जी से जहान है; जब आबरू ही न रही, तो जीने पर धिाक्कार है।
मन में यह विचार स्थिर करके सूरदास अपनी झोंपड़ी से निकला और लाठी टेकता हुआ गोदाम की तरफ चला। गोदाम के सामने पहुँचा, तो दयागिरि से भेंट हो गई। उन्होंने पूछा-इधार कहाँ चले सूरदास? तुम्हारी जगह तो पीछे छूट गई।
सूरदास-जरा इन्हीं मियाँ साहब से कुछ बातचीत करनी है।
दयागिरि-क्या इसी जमीन के बारे में?
सूरदास-हाँ, मेरा विचार है कि यह जमीन बेचकर कहीं तीर्थयात्रा करने चला जाऊँ। इस मुहल्ले में अब निबाह नहीं है।
के पहले एक बार इंदु से एकांत में मिलने का मौका मिल जाता, तो अच्छा होता। क्या करूँ, इंदु को बुला भेजूँ? न जाने क्या करने लगी। प्यानो बजाऊँ, तो शायद सुनकर आए।
उधार इंदु भी सोफ़िया से कितनी ही बातें करना चाहती थी। रानीजी के सामने उसे दिल की बातें करने का अवसर न मिला था। डर रही थी कि सोफिया के पिता उसे लेते गए, तो मैं फिर अकेली हो जाऊँगी। डॉक्टर गांगुली ने कहा था कि इन्हें ज्यादा बातें मत करने देना, आज और आराम से सो लें, तो फिर कोई चिंता न रहेगी।