तो गाड़ी की आहट पाते ही ईश्वर सेवक ने बड़ी स्नेहमयी उत्सुकता से पूछा-सोफी आ गई न? आ, तुझे गले लगा लूँ। ईसू तुझे अपने दामन में ले।

जॉन सेवक-पापा, वह अभी यहाँ आने के योग्य नहीं है। बहुत अशक्त हो गई है। दो-चार दिन बाद आवेगी।

ईश्वर सेवक-गज़ब खुदा का! उसकी यह दशा है, और तुम सब उसे उसके हाल पर छोड़ आए! क्या तुम लोगों में जरा भी मानापमान का विचार नहीं रहा! बिल्कुल खून सफेद हो गया?

मिसेज़ सेवक-आप जाकर उसकी खुशामद कीजिएगा, तो आवेगी। मेरे कहने से तो नहीं आई। बच्ची तो नहीं कि गोद में उठा लाती?

जॉन सेवक-पापा, वहाँ बहुत आराम से है। राजा और रानी, दोनों ही उसके साथ प्रेम करते हैं। सच पूछिए, तो रानी ही ने उसे नहीं छोड़ा।

ईश्वर सेवक-कुँवर साहब से कुछ काम की बातचीत भी हुई?

जॉन सेवक-जी हाँ, मुबारक हो। 50 हजार की गोटी हाथ लगी।


149 of 1634

कमरे में पाया। गुलाब और चंदन की सुगंधा आ रही थी। उसके सामने कुरसी पर वही महिला बैठी हुई थी, जिन्हें उसने सुषुप्तावस्था में सेंट मेरी समझा था, और सिरहाने की ओर एक वृध्द पुरुष बैठे थे, जिनकी ऑंखों से दया टपकी पड़ती थी। इन्हीं को कदाचित् उसने, अर्ध्द चेतना की दशा में, ईसा समझा था। स्वप्न की रचना स्मृतियों की पुनरावृत्ति-मात्रा होती है।

सोफ़िया ने क्षीण स्वर में पूछा-मैं कहाँ हूँ? मामा कहाँ हैं?

वृध्द पुरुष ने कहा-तुम कुँवर भरतसिंह के घर में हो। तुम्हारे सामने रानी साहबा बैठी हुई हैं, तुम्हारा जी अब कैसा है?


149 of 2700