मिसेज़ सेवक-वह आए भी तो, या जबरन घसीट लाती?
जॉन सेवक-आई नहीं या रानी ने आने नहीं दिया?
प्रभु सेवक-वह तो आने को तैयार थी, किंतु इसी शर्त पर कि मुझ पर कोई धार्मिक अत्याचार न किया जाए।
जॉन सेवक-इन्हें यह शर्त क्यों मंजूर होने लगी!
मिसेज़ सेवक-हाँ, इस शर्त पर मैं उसे नहीं ला सकती। वह मेरे घर रहेगी, तो मेरी बात माननी पड़ेगी।
जॉन सेवक-तुम दोनों में एक का भी बुध्दि से सरोकार नहीं। तुम सिड़ी हो, वह जिद्दी है। उसे मना-मनूकर जल्दी लाना चाहिए।
प्रभु सेवक-अगर मामा अपनी बात पर अड़ी रहेंगी, तो शायद वह फिर घर न जाए।
जॉन सेवक-आखिर जाएगी कहाँ?
प्रभु सेवक-उसे कहीं जाने की जरूरत ही नहीं। रानी उस पर जान देती हैं।
जॉन सेवक-यह बेल मुँढ़े चढ़ने की नहीं है। दो में से एक को दबना पड़ेगा।
लोग घर पहुँचे,
अभागे की जान बच गई; लेकिन सोफ़िया का कोमल गात आग की लपट से झुलस गया। वह ज्वालाओं के घेरे से बाहर आते ही अचेत होकर जमीन पर गिर पड़ी।
सोफ़िया ने तीन दिन तक ऑंखें न खोलीं। मन न जाने किन लोकों में भ्रमण किया करता था। कभी अद्भुत, कभी भयावह दृश्य दिखाई देते। कभी ईसा की सौम्य मूर्ति ऑंखों के सामने आ जाती, कभी किसी विदुषी महिला के चंद्रमुख के दर्शन होते, जिन्हें यह सेंट मेरी समझती।
चौथे दिन प्रात:काल उसने ऑंखें खोलीं, तो अपने को एक सजे हुए