उधार मि. जॉन सेवक और कुँवर साहब दीवानखाने में बैठे लंच कर रहे थे। चाय और अंडों से कुँवर साहब को रुचि न थी। विनय भी इन दोनों वस्तुओं को त्याज्य समझते थे। जॉन सेवक उन मनुष्यों में थे, जिनका व्यक्तित्व शीघ्र ही दूसरों को आकर्षित कर लेता है। उनकी बातें इतनी विचारपूर्ण होती थीं कि दूसरे अपनी बातें भूलकर उन्हीं की सुनने लगते थे। और, यह बात न थी कि उनका भाषण शब्दाडम्बर-मात्रा होता हो। अनुभवशील और मानव-चरित्र के बड़े अच्छे ज्ञाता थे। ईश्वरदत्ता प्रतिभा थी, जिसके बिना किसी सभा में सम्मान नहीं प्राप्त हो सकता। इस समय वह भारत की औद्योगिक और व्यावसायिक दुर्बलता पर अपने विचार प्रकट कर रहे थे। अवसर पाकर उन साधानों का भी उल्लेख करते जाते थे, जो इस कुदशा-निवारण के लिए उन्होंने सोच रखे थे। अंत में बोले-हमारी जाति का उध्दार कला-कौशल और उद्योग की उन्नति में
सोफ़िया-मैं हृदय से उनकी श्रध्दा करती हूँ।
माँ-तू झूठ बोलती है।
सोफ़िया-अगर दिल में श्रध्दा न होती, तो जबान से कदापि न कहती।
माँ-तू प्रभु मसीह को अपना मुक्तिदाता समझती है? तुझे यह विश्वास है कि वही तेरा उध्दार करेंगे?
सोफ़िया-कदापि नहीं। मेरा विश्वास है कि मेरी मुक्ति, अगर मुक्ति हो सकती है, तो मेरे कर्मों से होगी।
माँ-तेरे कर्मों से तेरे मुँह में कालिख लगेगी, मुक्ति न होगी।
यह कहकर मिसेज़ सेवक फिटन पर जा बैठीं। संध्या हो गई थी। सड़क पर ईसाइयों