उसे विश्वास होता जाता था कि सोफी हमसे सदा के लिए विदा हो गई। आज भी, रोज की भाँति, एक बजे थका-माँदा, उदास और निराश लौटकर आया, तो जॉन सेवक ने शुभ सूचना दी-सोफ़िया का पता मिल गया।

प्रभु सेवक का चेहरा खिल उठा। बोला-सच! कहाँ? क्या उसका कोई पत्र आया है?

जॉन सेवक-कुँवर भरतसिंह के मकान पर है। जाओ, खाना खा लो। तुम्हें भी वहाँ चलना है।

प्रभु सेवक-मैं तो लौटकर खाना खाऊँगा। भूख गायब हो गई। है तो अच्छी तरह?

मिसेज़ सेवक-हाँ, हाँ, बहुत अच्छी तरह है। खुदा ने यहाँ से रूठकर जाने की सजा दे दी।

प्रभु सेवक-मामा, खुदा ने आपका दिल न जाने किस पत्थर का बनाया है। क्या घर से आप ही रूठकर चली गई थी? आप ही ने उसे निकाला, और अब भी आपको उस पर जरा भी दया नहीं आती?

मिसेज़ सेवक-गुमराहों पर दया करना पाप है।

प्रभु सेवक-अगर


116 of 1634



जब मिसेज़ सेवक ने अब भी सहारा न दिया, तो ईश्वर सेवक लकड़ी के सहारे उठे और लाठी टेकते हुए सोफ़िया के कमरे में द्वार पर आकर बोले-बेटी सोफी, कहाँ है? इधार आ बेटी, तुझे गले से लगाऊँ। मेरा मसीह खुदा का दुलारा बेटा था, दीनों का सहायक, निर्बलों का रक्षक, दरिद्रों का मित्र, डूबतों का सहारा, पापियों का उध्दारक, दुखियों का पार लगानेवाला! बेटी, ऐसा और कौन-सा नबी है, जिसका दामन इतना चौड़ा हो, जिसकी गोद में संसार के सारे पापों, सारी बुराइयों के लिए स्थान हो?


116 of 2700