जॉन सेवक-मुझे अभी साथ न ले जाइए, मैं किसी दूसरे अवसर पर जाऊँगा। इस वक्त वहाँ शिष्टाचार के सिवा और कोई काम न होगा। मैं उन्हें धन्यवाद दूँगा, वह मुझे धन्यवाद देंगे। मैं इस परिचय को दैवी प्रेरणा समझता हूँ। इतमीनान से मिलूँगा। कुँवर साहब का शहर में बड़ा दबाव है। म्युनिसिपैलिटी के प्रधान उनके दामाद हैं। उनकी सहायता से मुझे पाँड़ेपुरवाली जमीन बड़ी आसानी से मिल जाएगी। सम्भव है, वह कुछ हिस्से भी खरीद लें। मगर आज इन बातों का मौका नहीं है।
ईश्वर सेवक-मुझे तुम्हारी बुध्दि पर हँसी आती है। जिस आदमी से राह-रस्म पैदा करके तुम्हारे इतने काम निकल सकते हैं, उससे मिलने में भी तुम्हें इतना संकोच? तुम्हारा समय इतना बहुमूल्य है कि आधा घंटे के लिए भी वहाँ नहीं जा सकते? पहली ही मुलाकात में सारी बातें तय कर लेना चाहते हो? ऐसा सुनहरा अवसर पाकर भी तुम्हें उससे फायदा उठाना नहीं आता?
सोफ़िया-धार्मिक विषयों में मैं अपनी विवेक-बुध्दि के सिवा और किसी के आदेशों को नहीं मानती।
मिसेज़ सेवक-मैं तुझे अपनी संतान नहीं समझती, और तेरी सूरत नहीं देखना चाहती।
यह कहकर सोफ़िया के कमरे में धुस गईं, और उसकी मेज पर से बौध्द-धर्म और वेदांत के कई ग्रंथ उठाकर बाहर बरामदे में फेंक दिए! उसी आवेश में उन्हें पैरों से कुचला और जाकर ईश्वर सेवक से बोलीं-पापा, आप सोफी को नाहक बुला रहे हैं, वह प्रभु मसीह की निंदा कर रही है।
मि. ईश्वर सेवक