रहना चाहती हूँ, जहाँ मेरी स्वाधीनता में बाधा डालनेवाला कोई न हो। मैं सत्पथ पर रहूँगी, या कुपथ पर चलूँगी, यह जिम्मेवारी भी अपने ही सिर लेना चाहती हूँ। मैं बालिग हूँ और अपना नफा-नुकसान देख सकती हूँ। आजन्म किसी की रक्षा में नहीं रहना चाहती; क्योंकि रक्षा का कार्य पराधीनता के सिवा और कुछ नहीं।
इंदु-क्या तुम अपने मामा और पापा के अधीन नहीं रहना चाहतीं?
सोफ़िया-न, पराधीनता में प्रकार का नहीं, केवल मात्राओं का अंतर है।
इंदु-तो मेरे ही घर क्यों नहीं रहतीं? मैं इसे अपना सौभाग्य समझ्रूगी! और अम्माँजी तो तुम्हें ऑंखों की पुतली बनाकर रखेंगी। मैं चली जाती हूँ, तो वह अकेले घबराया करती हैं। तुम्हें पा जाएँ तो फिर गला न छोड़ें। कहो तो अम्माँ से कहूँ? यहाँ तुम्हारी स्वाधीनता में कोई दखल न देगा। बोलो, कहूँ जाकर अम्माँ से?
सोफ़िया-नहीं, अभी भूलकर भी नहीं। आपकी अम्माँजी को जब मालूम
बेटी को बुलाने आ रही थीं। अंतिम शब्द उनके कानों में पड़ गए। तिलमिला गईं। आकर बोलीं-बेशक, ईश्वर-ग्रंथ पढ़ना बेगार है, मसीह का नाम लेना पाप है, तुझे तो उस भिखारी अंधे की बातों में आनंद आता है, हिंदुओं के गपोड़े पढ़ने में तेरा जी लगता है; ईश्वर-वाक्य तो तेरे लिए जहर है। खुदा जाने, तेरे दिमाग में यह खब्त कहाँ से समा गया है। जब देखती हूँ, तुझे अपने पवित्र धर्म की निंदा ही करते देखती हूँ। तू अपने मन में भले ही समझ ले कि ईश्वर-वाक्य कपोल-कल्पना है, लेकिन