सोफ़िया-अरे, यह कब?
इंदु-इसे तो दो साल हो गए। (ऑंखें नीची करके) अगर मेरा अपना वश होता, तो उन्हें कभी न वरती, चाहे कुँवारी ही रहती। मेरे स्वामी मुझसे प्रेम करते हैं, धान की कोई कमी नहीं। पर मैं उनके हृदय के केवल चतुर्थांश की अधिाकारिणी हूँ, उसके तीन भाग सार्वजनिक कामों में भेंट होते हैं। एक के बदले चौथाई पाकर कौन संतुष्ट हो सकता है? मुझे तो बाजरे की पूरी बिस्कुट के चौथाई हिस्से से कहीं अच्छी मालूम होती है। क्षुधा तो तृप्त हो जाती है, जो भोजन का यथार्थ उद्देश्य है।
सोफिया-आपकी धार्मिक स्वाधीनता में तो बाधा नहीं डालते?
इंदु-नहीं। उन्हें इतना अवकाश कहाँ?
सोफ़िया-तब तो मैं आपको मुबारकबाद दूँगी।
इंदु-अगर किसी कैदी को बधाई देना उचित हो, तो शौक से दो।
सोफ़िया-बेड़ी प्रेम की हो तो?
इंदु-ऐसा होता, तो मैं तुमसे बधाई देने को आग्रह करती। मैं बँधा
वहाँ के बड़े-बड़े विद्वानों और साहित्य-सेवियों से वार्तालाप करने में जो आनंद मिलता था, वह कारखाने में कहाँ नसीब था? सच पूछो, तो मैं इसीलिए वहाँ गया ही था। अब घोर संकट में पड़ा हुआ हूँ। अगर इस काम में हाथ नहीं लगाता, तो पापा को दु:ख होगा, वह समझेंगे कि मेरे हजारों रुपये पानी में गिर गए! शायद मेरी सूरत से घृणा करने लगें। काम शुरू करता हूँ तो यह भय होता है कि कहीं मेरी बेदिली से लाभ के बदले हानि न हो। मुझे इस काम में जरा भी उत्साह नहीं। मुझे तो