मानसिक और इसलिए सत्य है। असली स्वाधीनता वही है, जो विचार के प्रवाह में बाधक न हो।
इंदु-तुम गिरजे में कभी नहीं जातीं?
सोफ़िया-पहले दुराग्रह-वश जाती थी, अबकी नहीं गई। इस पर घर के लोग बहुत नाराज हुए। बुरी तरह तिरस्कार किया गया।
इंदु ने प्रेममयी सरलता से कहा-वे लोग नाराज हुए होंगे, तो तुम बहुत रोयी होगी। इन प्यारी ऑंखों से आँसू बहे होंगे। मुझसे किसी का रोना नहीं देखा जाता।
सोफिया-पहले रोया करती थी, अब परवा नहीं करती।
इंदु-मुझे तो कभी कोई कुछ कह देता है, तो हृदय पर तीर-सा लगता है। दिन-दिन भर रोती ही रह जाती हूँ। आँसू ही नहीं थमते। वह बात बार-बार हृदय में चुभा करती है। सच पूछो, तो मुझे किसी के क्रोध पर रोना नहीं आता, रोना आता है अपने ऊपर कि मैंने उन्हें क्यों नाराज किया, क्यों मुझसे ऐसी भूल हुई।
सोफ़िया को भ्रम
सोफ़िया-तुम क्या समझते हो?
प्रभु सेवक-मैं कुछ नहीं समझता, और न कुछ समझना ही चाहता हूँ। भोजन, निद्रा और विनोद, ये ही मनुष्य-जीवन के तीन तत्तव हैं। इसके सिवा सब गोरखधंधा है। मैं धर्म को बुध्दि से बिल्कुल अलग समझता हूँ। धर्म को तोलने के लिए बुध्दि उतनी ही अनुपयुक्त है, जितना बैंगन तोलने के लिए सुनार का काँटा। धर्म धर्म है, बुध्दि, बुध्दि। या तो धर्म का प्रकाश इतना तेजोमय है कि बुध्दि की ऑंखें चौंधिया जाती हैं, या इतना घोर अंधकार है कि बुध्दि को कुछ नजर