चिंता न रहेगी। इसलिए वह आने का इरादा करके भी रह जाती थी। आखिर नौ बजते-बजते वह अधीर हो गई। आकर नौकरानी को अपना कमरा साफ करने के बहाने से हटा दिया और सोफ़िया के सिरहाने बैठकर बोली-क्यों बहन, बहुत कमजोरी तो नहीं मालूम होती?
सोफ़िया-बिल्कुल नहीं। मुझे तो मालूम होता है कि मैं चंगी हो गई।
इंदु-तुम्हारे पापा कहीं तुम्हें अपने साथ ले गए, तो मेरे प्राण निकल जाएँगे। तुम भी उनकी राह देख रही हो। उनके आते ही खुश होकर चली जाओगी, और शायद फिर कभी याद न करोगी।
यह कहते-कहते इंदु की ऑंखें सजल हो गईं। मनोभावों के अनुचित आवेश को हम बहुधा मुस्कराहट से छिपाते हैं। इंदु की ऑंखों में आँसू भरे हुए थे, पर वह मुस्करा रही थी।
सोफिया बोली-आप मुझे भूल सकती हैं, पर मैं आपको कैसे भूलूँगी?
वह अपने दिल का दर्द सुनाने ही जा रही थी कि
लाकर उधार खर्च कर दिया, तो क्या फायदा? इससे तो न लाना ही अच्छा। समझाता ही रहा; पर इतनी ऊँची रास का घोड़ा ले लिया। इसकी क्या जरूरत थी? तुम्हें घुड़दौड़ नहीं करना है। एक टट्टू से काम चल सकता था। यही न कि औरों के घोड़े आगे निकल जाते, तो इसमें तुम्हारी क्या शेखी मारी जाती थी। कहीं दूर जाना नहीं पड़ता। टट्टू होता, छ: सेर की जगह दो सेर दाना खाता। आखिर चार सेर दाना व्यर्थ ही जाता है न? मगर मेरी कौन सुनता है? ईसू, मुझे अपने दामन में छुपा। सोफी, यहाँ आ बेटी, कलामेपाक सुना।